4 फ़र॰ 2012

आम आदमी के जज्बातों को आवाज देतीं ग़ज़लें : 'मौसम के हवाले से '

 

एक संजीदा शायर होने के साथ ही वर्तमान अशिक्षा से लड़ते एक निष्ठावान अध्यापक और सामाजिक विद्रूपताओं के विरुद्ध खड़े एक सजग पत्रकार शिवशरण जी बंधु का नवीनतम गज़ल संग्रह -'मौसम के हवाले से ' अभी हाल में प्रकाशित हुआ है जिसमें वो एक तरफ तो देश में निरंतर पैर पसार रही गंदी राजनीति से चिंतित और दूसरी तरफ गाँवों की बदहाली से परेशान आम आदमी के जज्बातों को आवाज देने की कोशिश की है जिसमे वे काफी हद तक सफल भी रहे हैं।  (मोडरेटर)

असगर वजाहत साहब (बिलकुल बाएं) के साथ शिवशरण बंधु (बीच में) और साथ में मैं प्रेमनंदन (बिलकुल दाहिने)

उन्होंने अपनी गज़लों में गरीबी , शोषण , अत्याचार , और साम्प्रदायिकता का पुरजोर विरोध किया है | साम्प्रदायिकता के खिलाफ उनका यह शेर देखिये-
हिदू थे, मुसलमां थे, ईसाई थे, सिक्ख थे, 
बस्ती में मगर एक भी इंसान नहीं था।


एक कृषि प्रधान देश में किसानों की आत्महत्यायें होना भले ही सरकारों के लिए शर्म की बात न हो लेकिन बंधु जी इससे बहुत ही विचलित हो कर यह कह उठते हैं-
हर रोज यहाँ भूख से मरते हैं परिंदे, 
कहने को दरख्त पे फल बेहिसाब हैं।


देश की आधी आबादी को अधिकतर लोग भले ही कमतर समझते हों लेकिन शायर की नजर में लड़कियाँ कमजोर नहीं हैं -
कमजोर समझने की कभी भूल न करना, 
हर दौर में इतिहास बदलती हैं लड़कियाँ।

आज के राजनीतिक परिद्रश्य और राजनैतिक नीचता को वे इन शब्दों में बयाँ करते हैं -
जो बड़े किर्दार थे वो सब पसे -मंजर हुए, 
मंच पर कुछ मसखरों के साथ जोकर रह गए।


बंधु जी की शायरी निचले तबके के एक पढ़े - लिखे आधुनकि व्यक्ति की ऐसी पद्धात्मक डायरी है जिसमें उनके निजी मिजाज और शायरी दोनों का रंग एक है। उनके कुछ रंग देखिये-

संसद है या शंकर जी का कुनबा है,
बैठे हैं सब लोग गले में डाले साँप।

मुकम्मल तौर पर नंगा है जिस्मो-रूह से लेकिन,
हमारे बीच आने पर लबादा ओढ़ लेता है।

बस वही तो है आदमी सच्चा, 
जिसके रहता है , आदमी दिल में।

बादल ने जबसे पहना सियासत का पैरहन, 
कमजोर मकानों पे ही गिरती हैं बिजलियाँ।

उनकी गजलों पर कहने को तो बहुत कुछ है लेकिन उनकी गुजारिश बस इतनी सी-ही है -

चुपचाप अकेले में पढ़ लेना गज़ल मेरी, 
फिर उसका असर लिखना, मौसम के हवाले से।

6 टिप्‍पणियां:
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  1. यह मुलाक़ात भी अच्छी रह ! ऐसे ही हमें मिलाते रहो,हम भी सुधर जायेंगे !

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  2. भाई शिवशरण बंधु जी हमारे साथी ही हैं ....अक्सर साहित्य की महफ़िलों में दीखते रहते हैं ....आपके माध्यम से उनके रचनाकर्म के बारे में जानना एक नया अनुभव रहा!

    धन्यवाद !

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