21 फ़र॰ 2011

गुलामी सबसे अधिक भयावह तब होती है, जब वह स्वभाव बन जाती है।

 

गुलामी सबसे अधिक भयावह तब होती है, जब वह स्वभाव बन जाती है। स्त्रियों के अंदर पराधीनता का बोध ही नहीं है, इसलिए स्त्री विमर्श का पहला काम है पराधीनता का बोध करना और दूसरा काम पराधीनता के कारणों का बोध कराना है। यह हो जाए तो पराधीनता के कारणों की खोज करना। इसके बाद इन्हें दूर करने का प्रयास करना। यह बात रविवार को फतेहपुर शहर में स्थित महात्मागांधी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में आयोजित 'समकालीन साहित्य एवं स्त्री विमर्श विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी' में जेएनयू, नई दिल्ली के भारतीय भाषा केंद्र के प्रोफेसर व अध्यक्ष डा.मैनेजर पांडेय ने नारी सशक्तिकरण पर जोर देते हुए कही।



स्त्रियों की दशा पहले भी वही थी जो आज है बस प्रताड़ना का रूप भर बदल गया है। स्त्री के कष्ट को कमरों में बैठ कर या उच्च वर्ग की महिलाओं को देखकर नहीं समझा जा सकता है उसे समझना है तो गाँव , गली की नारी से या मेहनत मजदूरी करने वाली औरत से अथवा सम्मान या अधिकार के लिए संघर्ष कर जी रही महिला से मिलना हौगा। स्त्री की गुलामी खतम हो इसके लिए उसकी सोच में बदलाव हो और सोच में बदलाव के लिए जरूरी है कि नारी शिक्षित हो।


महात्मा गांधी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिंदी विभाग द्वारा समकालीन साहित्य और स्त्री विमर्श विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले दिन वक्ताओं ने उक्त विचार रखे। राष्ट्रीय संगोष्ठी का उदघाटन वरिष्ठ हिंदी आलोचना के स्तंभ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली में भारतीय भाषा केन्द्र के प्रोफेसर व अध्यक्ष डा. मैनेजर पांडेय व कालेज के प्राचार्य डा. अवधेश कुमार सिंह ने किया। माँ सरस्वती, महात्मा गांधी और महादेवी वर्मा के चित्रों पर माल्यार्पण कर संगोष्ठी की शुरूआत की गयी ।


विशिष्ट अतिथि डा. भीम राव आंबेडकर महाविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. बालकृष्ण पांडेय ने स्त्री विमर्श के संबंध में कुछ प्रश्न और कुछ चिंताएं सदन के सामने रखे। राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय ज्ञानपुर के हिंदी विभाग अध्यक्ष डा.क्षमा शंकर पांडेय ने स्त्री विमर्श के महत्वपूर्ण पहलुओं को रेखांकित किया। संगोष्ठी का दूसरा सत्र अपरान्ह दो बजे से शुरू हुआ। बौद्धिक विमर्श के इस सत्र की अध्यक्षता आलोचक डा.ओम प्रकाश अवस्थी ने की। संयोजक प्रोफेसर अनूप शुक्ल ने संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। अध्यक्षता करते हुए कालेज के प्राचार्य डा.अवधेश कुमार सिंह ने कहा कि स्त्रियों की दुर्दशा का अंदाजा अभिजात्य परिवारों की महिलाओं अथवा संचार माध्यमों की नारी छवि से नहीं लगाया जा सकता। इसके लिए दूरस्थ अंचलों की ग्रामीण और श्रमिक महिलाओं के बीच जाना पड़ेगा।


सलौन डिग्री कालेज रायबरेली के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डा. सीबी सिंह, कान्यकुब्ज कालेज लखनऊ के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डा. अनिल त्रिपाठी, वीएसएसडी कालेज कानपुर के प्रोफेसर डा. आनंद शुक्ल और यहीं के वरिष्ठ प्राध्यापक डा. रंजन श्रीवास्तव ने अपने विचार रखे। राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश प्रदेश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं के शिक्षाविद्, बुद्धिजीवी, साहित्यकार और सांस्कृतिक कर्मी मौजूद रहे।


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